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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 28th Oct 2022

    आसमाँ से बरस रहा है ख़ून!

    छतरियाँ तान लें जो पानी हो,आसमाँ से बरस रहा है ख़ून| सूर्यभानु गुप्त

  • 28th Oct 2022

    तार पर तार कस रहा है ख़ून!

    सौ दुखों का सितार हर चेहरा,तार पर तार कस रहा है ख़ून| सूर्यभानु गुप्त

  • 28th Oct 2022

    लोगों को डस रहा है ख़ून!

    गाँव में एक भी नहीं ओझा,और लोगों को डस रहा है ख़ून| सूर्यभानु गुप्त

  • 28th Oct 2022

    छूटने को तरस रहा है ख़ून!

    क़ैद इतने बरस रहा है ख़ून,छूटने को तरस रहा है ख़ून| सूर्यभानु गुप्त

  • 28th Oct 2022

    ये तो अच्छा हुआ भरम टूटे!

    रंज इसका नहीं कि हम टूटे,ये तो अच्छा हुआ भरम टूटे| सूर्यभानु गुप्त

  • 28th Oct 2022

    हमारे शहर में काबुल के आ गए!

    अनजाने साए फिरने लगे हैं इधर उधर, मौसम हमारे शहर में काबुल के आ गए| राहत इन्दौरी

  • 28th Oct 2022

    बंद ख़्वाब अगर खुल के आ गए!

    नींदों से जंग होती रहेगी तमाम उम्र, आँखों में बंद ख़्वाब अगर खुल के आ गए| राहत इन्दौरी

  • 28th Oct 2022

    अपने से मिल-जुल के आ गए!

    मस्जिद में दूर दूर कोई दूसरा न था, हम आज अपने आप से मिल-जुल के आ गए| राहत इन्दौरी

  • 28th Oct 2022

    सिपाही मोम के थे घुल के आ गए!

    सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़, सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए| राहत इन्दौरी

  • 28th Oct 2022

    सहनशीलता!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी हास्य कविता सम्राट माने जाने वाले स्वर्गीय काका हाथरसी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| ये कविता उनके जीवन काल की है तो ज़ाहिर है इसमें की गए संदर्भ भी उस समय के ही हैं| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय काका हाथरसी जी की यह कविता –…

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