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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th Oct 2022

    आदमी से बहुत बड़े हैं पेड़!

    मौत तक दोस्ती निभाते हैं,आदमी से बहुत बड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त

  • 29th Oct 2022

    कुछ हैं छोटे तो कुछ बड़े हैं पेड़!

    अपनी दुनिया के लोग लगते हैं,कुछ हैं छोटे तो कुछ बड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त

  • 29th Oct 2022

    परचमों की तरह गड़े हैं पेड़!

    जीत कर कौन इस ज़मीं को गया,परचमों की तरह गड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त

  • 29th Oct 2022

    कौन कहता है ये कड़े हैं पेड़!

    कोंपलें फूल पत्तियाँ देखो,कौन कहता है ये कड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त

  • 29th Oct 2022

    कौन सी बात पर अड़े हैं पेड़!

    जिस जगह हैं न टस से मस होंगे,कौन सी बात पर अड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त

  • 29th Oct 2022

    साल हा साल से खड़े हैं पेड़!

    क्या ख़बर इंतिज़ार है किसका,साल हा साल से खड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त

  • 29th Oct 2022

    हाल पूछा तो रो पड़े हैं पेड़!

    बाग़बाँ हो गये लकड़हारे,हाल पूछा तो रो पड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त

  • 29th Oct 2022

    आँसुओं की तरह झडे हैं पेड़!

    कौन आया था किससे बात हुई,आँसुओं की तरह झडे हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त

  • 29th Oct 2022

    रात तूफ़ान से लड़े हैं पेड़!

    उल्टे सीधे गिरे पड़े हैं पेड़,रात तूफ़ान से लड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त

  • 29th Oct 2022

    जीवन!

    आज एक बार फिर मैं आधुनिक हिन्दी कविता में अपना अलग स्थान बनाने वाले श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक वाजपेयी जी का कविता लिखने का, अभिव्यक्ति का अलग ही अंदाज़ है, जो इस कविता में भी प्रदर्शित होता है| लीजिए, आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की…

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