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घूँट को कड़वा किया न जाए!
हर वक़्त हमसे पूछ न ग़म रोज़गार के,हम से हर घूँट को कड़वा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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सिफारिशों को इकट्ठा किया न जाए!
ईनाम हो, ख़िताब हो, वैसे मिले कहाँ,जब तक सिफारिशों को इकट्ठा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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इस तरह का तमाशा किया न जाए!
लहजा बना के बात करें उनके सामने,हमसे तो इस तरह का तमाशा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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किसी पे भरोसा किया न जाए!
हर-चंद एतिबार में धोखे भी है मगर,ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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हर बात पे झगड़ा किया न जाए!
उनकी रविश जुदा है हमारी रविश जुदा,हमसे तो हर बात पे झगड़ा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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सूना किया न जाए!
उठने को उठ तो जाएँ तेरी अंजुमन से हम,पर तेरी अंजुमन को भी सूना किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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अपने-आप को तन्हा किया न जाए!
हम हैं तेरा ख़याल है तेरा जमाल है,इक पल भी अपने-आप को तन्हा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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कुत्ते तभी भौंकते हैं!
हमारे काव्य मंचों पर हिन्दी के जो कुछ स्तरीय हास्य-व्यंग्य कवि रहे हैं, स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी जी उनमें शामिल थे| अल्हड़ जी ने मंचों से हास्य व्यंग्य की अनेक स्तरीय रचनाएं हमें दी हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी जी की यह कविता जिसमें उन्होंने कुत्तों के बहाने कुछ अच्छी अभिव्यक्ति दी है–…
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आपको रुसवा किया न जाए!
अच्छा है उनसे कोई तक़ाज़ा किया न जाए,अपनी नज़र में आपको रुसवा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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सुनहरा दिखाई पड़ता है!
चमकती रेत पर ये ग़ुस्ल-ए-आफ़ताब तेरा,बदन तमाम सुनहरा दिखाई पड़ता है| जाँ निसार अख़्तर