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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Nov 2022

    समुंदर की तरफ़ जाना भी!

    ख़ुद को पहचान के देखे तो ज़रा ये दरिया, भूल जाएगा समुंदर की तरफ़ जाना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    और तिरा कहलाना भी!

    ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं, तेरा होना भी नहीं और तिरा कहलाना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    आसाँ तो नहीं लौट के घर आना भी!

    जाने कब शहर के रिश्तों का बदल जाए मिज़ाज, इतना आसाँ तो नहीं लौट के घर आना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    इक दिन तिरा याद आना भी!

    दिल की बिगड़ी हुई आदत से ये उम्मीद न थी, भूल जाएगा ये इक दिन तिरा याद आना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    होना ही नहीं फूल नज़र आना भी!

    कैसी आदाब-ए-नुमाइश ने लगाईं शर्तें, फूल होना ही नहीं फूल नज़र आना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी!

    कितना दुश्वार था दुनिया ये हुनर आना भी, तुझ से ही फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    मरघट!

    किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों से जिन कवियों को सुनने में मुझे काफी आनंद आता था, उनमें स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी भी शामिल थे| उनके एक गीत की पंक्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हुई थीं- एक पुराने दुख ने पूछा क्या तुम अभी वहीं रहते हो, उत्तर दिया चले मत आना, मैंने वो घर बदल…

  • 7th Nov 2022

    अंजाम की वो इब्तिदा थी!

    मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था, मिरे अंजाम की वो इब्तिदा थी| जावेद अख़्तर

  • 7th Nov 2022

    मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी!

    कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है, मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी| जावेद अख़्तर

  • 7th Nov 2022

    हिरन को अपनी कस्तूरी सज़ा थी!

    बिछड़ के डार से बन बन फिरा वो, हिरन को अपनी कस्तूरी सज़ा थी| जावेद अख़्तर

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