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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Nov 2022

    बैठे हैं छुप के कहाँ ख़ुदा जाने!

    हुआ है हुक्म कि ‘कैफ़ी’ को संगसार करो, मसीह बैठे हैं छुप के कहाँ ख़ुदा जाने| कैफ़ी आज़मी

  • 6th Nov 2022

    आज तलब कर लिया है सहरा ने!

    बहार आए तो मेरा सलाम कह देना, मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने| कैफ़ी आज़मी

  • 6th Nov 2022

    तोड़े हैं यारों ने आज पैमाने!

    जहाँ से पिछले पहर कोई तिश्ना-काम उठा, वहीं पे तोड़े हैं यारों ने आज पैमाने| कैफ़ी आज़मी

  • 6th Nov 2022

    बंद किए जा रहे हैं बुत-ख़ाने!

    मिरे जुनून-ए-परस्तिश से तंग आ गए लोग, सुना है बंद किए जा रहे हैं बुत-ख़ाने| कैफ़ी आज़मी

  • 6th Nov 2022

    प्यास के फूँके हुए ये वीराने!

    यहाँ से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालो, हैं मेरी प्यास के फूँके हुए ये वीराने| कैफ़ी आज़मी

  • 6th Nov 2022

    यहाँ कौन किसको पहचाने!

    सुना करो मिरी जाँ इनसे उनसे अफ़्साने, सब अजनबी हैं यहाँ कौन किसको पहचाने| कैफ़ी आज़मी

  • 6th Nov 2022

    झरना!

    आज हिन्दी कविता में छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ रहे स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ| मैंने पहले भी उनकी कुछ रचनाएं शेयर की हैं| ‘कामायनी’, ‘आँसू’ आदि उनकी कालजयी रचनाएं हैं| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह कविता – तिरस्कार कालिमा कलित हैं,अविश्वास-सी पिच्छल हैं।कौन…

  • 5th Nov 2022

    क्या क्या समझ बैठे थे हम!

    हुस्न को इक हुस्न ही समझे नहीं और ऐ ‘फ़िराक़’, मेहरबाँ ना-मेहरबाँ क्या क्या समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 5th Nov 2022

    तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम!

    रफ़्ता रफ़्ता इश्क़ मानूस-ए-जहाँ होता चला, ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 5th Nov 2022

    ख़त्म हो जाना समझ बैठे थे हम!

    कान बजते हैं मोहब्बत के सुकूत-ए-नाज़ को, दास्ताँ का ख़त्म हो जाना समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी

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