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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 14th Nov 2022

    ख़ुशबू की तरह रंग हिना का होता!

    काँच के पार तिरे हाथ नज़र आते हैं, काश ख़ुशबू की तरह रंग हिना का होता| गुलज़ार

  • 14th Nov 2022

    पलकों की हवा का होता!

    साँस मौसम की भी कुछ देर को चलने लगती, कोई झोंका तिरी पलकों की हवा का होता| गुलज़ार

  • 14th Nov 2022

    दरिया की अना का होता!

    यूँ भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता, कोई एहसास तो दरिया की अना का होता| गुलज़ार

  • 14th Nov 2022

    ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता!

    ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता, मेरी तस्वीर भी गिरती तो छनाका होता| गुलज़ार

  • 14th Nov 2022

    ग्रहण!

    आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ कवि श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ | श्री बुदधिनाथ मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – शहरी विज्ञापन ने हमसेसब-कुछ छीन लिया । आंगन का मटमैला दर्पणपीपल के…

  • 13th Nov 2022

    थीं अमानतें कई साल की!

    वो क़यामतें जो गुज़र गईं, थीं अमानतें कई साल की| मुनीर नियाज़ी

  • 13th Nov 2022

    कोई हद नहीं है जमाल की!

    कोई हद नहीं है कमाल की, कोई हद नहीं है जमाल की| मुनीर नियाज़ी

  • 13th Nov 2022

    बाग़ में कोई ज़रूर था!

    निकला जो चाँद आई महक तेज़ सी ‘मुनीर’, मेरे सिवा भी बाग़ में कोई ज़रूर था| मुनीर नियाज़ी

  • 13th Nov 2022

    सदा थी किसी भूली याद की!

    चेहरा था या सदा थी किसी भूली याद की, आँखें थीं उसकी यारो कि दरिया-ए-नूर था| मुनीर नियाज़ी

  • 13th Nov 2022

    अपने आप पे कितना ग़ुरूर था!

    शाम-ए-फ़िराक़ आई तो दिल डूबने लगा, हमको भी अपने आप पे कितना ग़ुरूर था| मुनीर नियाज़ी

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