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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 13th Nov 2022

    वतन से कई मील दूर था!

    रोया था कौन कौन मुझे कुछ ख़बर नहीं, मैं उस घड़ी वतन से कई मील दूर था| मुनीर नियाज़ी

  • 13th Nov 2022

    वो भी बहुत ग़म से चूर था!

    कल मैंने उसको देखा तो देखा नहीं गया, मुझ से बिछड़ के वो भी बहुत ग़म से चूर था| मुनीर नियाज़ी

  • 13th Nov 2022

    वही रश्क-ए-हूर था!

    पी ली तो कुछ पता न चला वो सुरूर था, वो उसका साया था कि वही रश्क-ए-हूर था| मुनीर नियाज़ी

  • 13th Nov 2022

    गन्ने मेरे भाई!!

    आज मैं बिना किसी भूमिका के स्वर्गीय बालकवि वैरागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, बाकी कविता अपनी बात स्वयं कहती है| बालकवि वैरागी जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|लीजिए प्रस्तुत है बालकवि वैरागी जी की यह कविता – इक्ष्वाकु वंश के आदि पुरुषगन्ने! मेरे भाई!!रेशे-रेशे में रसऔर रग-रग…

  • 12th Nov 2022

    यारों से दामन न छुड़ाओ इंशा-जी!

    नहीं सिर्फ़ ‘क़तील’ की बात यहाँ कहीं ‘साहिर’ है कहीं ‘आली’ है, तुम अपने पुराने यारों से दामन न छुड़ाओ इंशा-जी| क़तील शिफ़ाई

  • 12th Nov 2022

    उनको न रुलाओ इंशा-जी!

    क्या सोच के तुम ने सींची थी ये केसर क्यारी चाहत की, तुम जिनको हँसाने आए थे उनको न रुलाओ इंशा-जी| क़तील शिफ़ाई

  • 12th Nov 2022

    ये ज़ुल्म न ढाओ इंशा-जी!

    जितने भी यहाँ के बासी हैं सब के सब तुमसे प्यार करें, क्या उनसे भी मुँह फेरोगे ये ज़ुल्म न ढाओ इंशा-जी| क़तील शिफ़ाई

  • 12th Nov 2022

    इसे छोड़ न जाओ इंशा-जी!

    ये किसने कहा तुम कूच करो बातें न बनाओ इंशा-जी, ये शहर तुम्हारा अपना है इसे छोड़ न जाओ इंशा-जी|(Tribute to Ibne Insha) क़तील शिफ़ाई

  • 12th Nov 2022

    चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ!

    अहबाब को दे रहा हूँ धोखा, चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 12th Nov 2022

    आईना उसे दिखा रहा हूँ!

    महरूम-ए-नज़र है जो ज़माना, आईना उसे दिखा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

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