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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th Nov 2022

    कभी नींद की गोली नहीं खाते!

    सो जाते हैं फ़ुटपाथ पे अख़बार बिछा कर, मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते| मुनव्वर राना

  • 16th Nov 2022

    न मिलेंगे ये क़सम भी नहीं खाते!

    तुमसे नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन, तुम से न मिलेंगे ये क़सम भी नहीं खाते| मुनव्वर राना

  • 16th Nov 2022

    क्यूँ शौक़ से मिट्टी नहीं खाते!

    हँसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते, बच्चे हैं तो क्यूँ शौक़ से मिट्टी नहीं खाते| मुनव्वर राना

  • 16th Nov 2022

    उम्र ज्यों—ज्यों बढ़ती है!

    आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक छोटी सी लेकिन प्रभावशाली कविता शेयर कर रहा हूँ, बढ़ती उम्र के बारे में एक अलग ही नजरिया इसमें प्रस्तुत किया गया है| सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की…

  • 15th Nov 2022

    आशिक़ की बारात हो गई है!

    दुनिया है कितनी बे-ठिकाना, आशिक़ की बारात हो गई है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 15th Nov 2022

    खेला हूँ तो मात हो गई है!

    जीती हुई बाज़ी-ए-मोहब्बत, खेला हूँ तो मात हो गई है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 15th Nov 2022

    बीमार की रात हो गई है!

    इस दौर में ज़िंदगी बशर की, बीमार की रात हो गई है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 15th Nov 2022

    मेरी औक़ात हो गई है!

    घटते घटते तिरी इनायत, मेरी औक़ात हो गई है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 15th Nov 2022

    अब मेरी हयात हो गई है!

    क्या जानिए मौत पहले क्या थी अब मेरी हयात हो गई है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 15th Nov 2022

    उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है!

    अब हो मुझे देखिए कहाँ सुब्ह, उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है| फ़िराक़ गोरखपुरी

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