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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 13th May 2022

    लहरों से टकराती तो है!

    इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है,नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है| दुष्यंत कुमार

  • 13th May 2022

    इतने बरसों बाद!

    आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| लंबे समय तक बरसात को तरसने के बाद जब गाँव देहात में बारिश होती है तो सबके मन को सरसा जाती है, कृषक परिवारों के मन में एक नया उल्लास आ जाता है| यह गीत…

  • 12th May 2022

    हवा का गुज़र नहीं होता!

    मैं उस मकान में रहता हूँ और ज़िंदा हूँ,‘वसीम’ जिसमें हवा का गुज़र नहीं होता। वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    फ़क़ीर को शाहों का डर नहीं होता!

    हमारी आँख के आँसू की अपनी दुनिया है,किसी फ़क़ीर को शाहों का डर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    सदाओं का घर नहीं होता!

    मुझे तलाश करोगे तो फिर न पाओगे,मैं इक सदा हूँ सदाओं का घर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    ख़ाक में मिलने का डर नहीं होता!

    मैं उसकी आँख का आँसू न बन सका वर्ना,मुझे भी ख़ाक में मिलने का डर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    बातों से सर नहीं होता!

    कभी लहू से भी तारीख़ लिखनी पड़ती है,हर एक मारका बातों से सर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    मुक़द्दर में घर नहीं होता!

    सभी का धूप से बचने को सर नहीं होता,हर आदमी के मुक़द्दर में घर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    ख़ता हो, उसी को सज़ा मिले!

    इस दौर ए मुंसिफ़ी में ज़रूरी नहीं ‘वसीम,जिस शख्स की ख़ता हो, उसी को सज़ा मिले|‘ वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    कुछ सूखे फूलों के गुलदस्ते!

    स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी अपनी किस्म के अनूठे कवि थे| बातचीत के लहज़े में कविता कहने का उनका निराला अंदाज़ था| मैंने पहले भी भवानी दादा की कुछ कविताएं शेयर की हैं|लीजिए आज प्रस्तुत है, हमारे भवानी दादा की यह कविता, जिसमें अभिव्यक्ति का एक अनूठा उदाहरण मिलता है – कुछ सूखे फूलों केगुलदस्तों…

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