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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Jul 2022

    हँसते हैं जाने पहचाने लोग!

    कौन ये जाने दीवाने पर कैसी सख़्त गुज़रती है, आपस में कुछ कह कर हँसते हैं जाने पहचाने लोग| राही मासूम रज़ा

  • 17th Jul 2022

    हमको आते हैं समझाने लोग!

    यादों से बचना मुश्किल है उनको कैसे समझाएँ, हिज्र के इस सहरा तक हमको आते हैं समझाने लोग| राही मासूम रज़ा

  • 17th Jul 2022

    रोज़ कहें अफ़्साने लोग!

    हम क्या जानें क़िस्सा क्या है हम ठहरे दीवाने लोग, उस बस्ती के बाज़ारों में रोज़ कहें अफ़्साने लोग| राही मासूम रज़ा

  • 17th Jul 2022

    अन्वेषण!

    आज फिर से मैं श्री रामनरेश त्रिपाठी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| त्रिपाठी जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और स्वाधीनता सेनानी भी थे| उनकी कुछ कविताओं का प्रार्थना के रूप में प्रयोग किया जाता है| जैसे- ‘हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए, शीघ्र सारे दुर्गुणों से दूर हमको कीजिए’ अथवा ‘मैं…

  • 16th Jul 2022

    हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है!

    अगर तबस्सुम-ए-ग़ुंचा की बात उड़ी थी यूँही, हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है| राही मासूम रज़ा

  • 16th Jul 2022

    ये दर्द जागता क्यूँ है!

    कहानियों की गुज़रगाह पर भी नींद नहीं, ये रात कैसी है ये दर्द जागता क्यूँ है | राही मासूम रज़ा

  • 16th Jul 2022

    जीने का हौसला क्यूँ है!

    जो दूर दूर नहीं कोई दिल की राहों पर, तो इस मरीज़ में जीने का हौसला क्यूँ है| राही मासूम रज़ा

  • 16th Jul 2022

    इतना फ़ासला क्यूँ है!

    सवाल कर दिया तिश्ना-लबी ने साग़र से, मेरी तलब से तिरा इतना फ़ासला क्यूँ है| राही मासूम रज़ा

  • 16th Jul 2022

    आख़िर ग़ुबार सा क्यूँ है!

    दिलों की राह पर आख़िर ग़ुबार सा क्यूँ है, थका थका मेरी मंज़िल का रास्ता क्यूँ है| राही मासूम रज़ा

  • 16th Jul 2022

    झर गये पात!

    लंबे समय के बाद आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| बैरागी जी ने अत्यंत गरीबी की स्थिति से अपना जीवन प्रारंभ किया था और अपने परिश्रम के बल पर वे एक सांसद बने और संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य भी बने| मैंने दिल्ली में रहते…

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