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उसे आज तक ये पता नहीं!
सर-ए-राह कुछ भी कहा नहीं कभी उस के घर मैं गया नहीं, मैं जनम जनम से उसी का हूँ उसे आज तक ये पता नहीं| बशीर बद्र
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मन!
आज फिर से एक बार मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, अवस्थी जी बहुत सरल भाषा में सहजता से अपनी बात कहते थे, जैसे मन से मन का संवाद हो| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत – मन को वश में करोफिर चाहे जो…
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बे-नाम ख़बर के हम हैं!
गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम, हर क़लमकार की बे-नाम ख़बर के हम हैं| निदा फ़ाज़ली
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खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं!
हम वहाँ हैं जहाँ कुछ भी नहीं रस्ता न दयार, अपने ही खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं| निदा फ़ाज़ली
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किस राहगुज़र के हम हैं!
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब, सोचते रहते हैं किस राहगुज़र के हम हैं| निदा फ़ाज़ली
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किसी दूसरे घर के हम हैं!
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है, अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं| निदा फ़ाज़ली
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अपनी मर्ज़ी से कहाँ !
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं, रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं| निदा फ़ाज़ली
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ये ख़ामोशी क्या चीज़ है!
हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी, और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है| निदा फ़ाज़ली
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मय-कशी क्या चीज़ है!
बिखरी ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शाइ’री, झुकती आँखों ने बताया मय-कशी क्या चीज़ है| निदा फ़ाज़ली
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प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है!
उनसे नज़रें क्या मिलीं रौशन फ़ज़ाएँ हो गईं, आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है| निदा फ़ाज़ली