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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Aug 2022

    क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें!

    तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा, दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें| अहमद फ़राज़

  • 9th Aug 2022

    शराबें जो शराबों में मिलें!

    ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो, नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें| अहमद फ़राज़

  • 9th Aug 2022

    मुमकिन है ख़राबों में मिलें

    ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती, ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें| अहमद फ़राज़

  • 9th Aug 2022

    सूखे हुए फूल किताबों में मिलें!

    अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें| अहमद फ़राज़

  • 9th Aug 2022

    ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं!

    आज मैं मुशायरों और कवि सम्मेलनों की मशहूर शायरा सुश्री अंजुम रहबर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| अंजुम जी का अंदाज़ ए बयां अलग तरह का रहा है| उनकी एक रचना काफी प्रसिद्ध है- ‘छुक-छुक, छुक-छुक रेल चली है जीवन की’| लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री अंजुम रहबर जी यह ग़ज़ल –…

  • 8th Aug 2022

    आइए ज़हर पी के देखते हैं!

    पानियों से तो प्यास बुझती नहीं, आइए ज़हर पी के देखते हैं| राहत इन्दौरी

  • 8th Aug 2022

    रास्ते वापसी के देखते हैं!

    टिकटिकी बाँध ली है आँखों ने, रास्ते वापसी के देखते हैं| राहत इन्दौरी

  • 8th Aug 2022

    ज़ख़्म सी के देखते हैं!

    धूप इतनी कराहती क्यूँ है, छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं| राहत इन्दौरी

  • 8th Aug 2022

    क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं!

    रोज़ हम इक अँधेरी धुंध के पार, क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं| राहत इन्दौरी

  • 8th Aug 2022

    ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं!

    नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है, ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं| राहत इन्दौरी

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