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क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें!
तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा, दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें| अहमद फ़राज़
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शराबें जो शराबों में मिलें!
ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो, नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें| अहमद फ़राज़
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मुमकिन है ख़राबों में मिलें
ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती, ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें| अहमद फ़राज़
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सूखे हुए फूल किताबों में मिलें!
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें| अहमद फ़राज़
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क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं!
रोज़ हम इक अँधेरी धुंध के पार, क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं| राहत इन्दौरी
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ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं!
नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है, ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं| राहत इन्दौरी