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दान!
आज मैं छायावाद युग के एक और प्रमुख कवि स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| निराला जी ‘राम की शक्ति पूजा’ तथा अन्य अनेक ऐसी श्रेष्ठ रचनाएं लिखकर भारतीय साहित्य में अमर हो गए थे| आज की रचना में ढोंगी दानवीरों को दर्शाया गया है जो हट्टे-कट्टे बंदरों को…
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अब ख़ुशी है न कोई!
अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला, हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला| निदा फ़ाज़ली
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नहीं हो तो बुझ जाना चाहिए!
बिजली का क़ुमक़ुमा न हो काला धुआँ तो हो, ये भी अगर नहीं हो तो बुझ जाना चाहिए| निदा फ़ाज़ली
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कोई दीवाना चाहिए!
चुप चुप मकान रास्ते गुम-सुम निढाल वक़्त, इस शहर के लिए कोई दीवाना चाहिए| निदा फ़ाज़ली
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लोगों से याराना चाहिए!
चौराहे बाग़ बिल्डिंगें सब शहर तो नहीं, कुछ ऐसे वैसे लोगों से याराना चाहिए| निदा फ़ाज़ली
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घटा को बरस जाना चाहिए!
झुकती हुई नज़र हो कि सिमटा हुआ बदन, हर रस-भरी घटा को बरस जाना चाहिए| निदा फ़ाज़ली
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ख़ुद से उलझ जाना चाहिए!
यूँ तो क़दम क़दम पे है दीवार सामने, कोई न हो तो ख़ुद से उलझ जाना चाहिए| निदा फ़ाज़ली
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मंदिर!
लंबे समय के बाद आज फिर से मैं छायावाद युग के प्रमुख कवि स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी की अनेक रचनाएं राष्ट्र की धरोहर हैं| इस कविता में ईश्वर के प्रति, आस्था के प्रति प्रश्न उठाने वाले लोगों को प्रसाद जी ने समुचित उत्तर दिया है, भले…