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इख़्लास समझते हो ‘फ़राज़!
तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो ‘फ़राज़,’ दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला| अहमद फ़राज़
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तिरे साथ एक दुनिया थी!
हुआ है तुझ से बिछड़ने के बा’द ये मा’लूम, कि तू नहीं था तिरे साथ एक दुनिया थी| अहमद फ़राज़
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चाहिएँ कितनी मोहब्बतें तुझे!
और ‘फ़राज़’ चाहिएँ कितनी मोहब्बतें तुझे, माओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया| अहमद फ़राज़
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शहर को करके ग़ुलाम रख दिया!
जो भी मिला उसी का दिल हल्क़ा-ब-गोश-ए-यार था, उसने तो सारे शहर को करके ग़ुलाम रख दिया| अहमद फ़राज़
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मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं!
देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं, मैंने तो सब हिसाब-ए-जाँ बर-सर-ए-आम रख दिया| अहमद फ़राज़
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पाँव में सारा कलाम रख दिया!
उसने नज़र नज़र में ही ऐसे भले सुख़न कहे, मैंने तो उसके पाँव में सारा कलाम रख दिया| अहमद फ़राज़
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मैंने भी जाम रख दिया!
शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मय-कशी रही, उसने जो फेर ली नज़र मैंने भी जाम रख दिया| अहमद फ़राज़
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दिल सर-ए-शाम रख दिया!
आमद-ए-दोस्त की नवेद कू-ए-वफ़ा में आम थी, मैंने भी इक चराग़ सा दिल सर-ए-शाम रख दिया| अहमद फ़राज़
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मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि श्री उदयभानु ‘हंस’ जी की एक रचना, शेयर कर रहा हूँ| इनको हरियाणा के राज्यकवि का दर्जा प्रदान किया गया, बाकी रचना स्वयं अपना परिचय देती है|लीजिए, प्रस्तुत है श्री उदयभानु ‘हंस’ जी की यह रचना- तू चाहे चंचलता कह ले,तू चाहे दुर्बलता कह ले,दिल ने ज्यों ही…
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हाथ में ख़ाली कमान बाक़ी है!
अब आया तीर चलाने का फ़न तो क्या आया, हमारे हाथ में ख़ाली कमान बाक़ी है| जावेद अख़्तर