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बात करने पे मजबूर हो गया!
तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना!, आईना बात करने पे मजबूर हो गया| बशीर बद्र
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ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया!
महलों में हमने कितने सितारे सजा दिए, लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया| बशीर बद्र
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गले लगा लिया वो दूर हो गया!
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया, जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया| बशीर बद्र
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स्तब्ध हैं कोयल!
आज मैं एक बार फिर हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बुदधिनाथ मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत– स्तब्ध हैं कोयल कि उनके स्वरजन्मना कलरव नहीं होंगे…
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हाथ बढ़ा कर देखो!
फ़ासला नज़रों का धोका भी तो हो सकता है, वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो| निदा फ़ाज़ली
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तुम भी बहल सको तो चलो!
यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें, इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो| निदा फ़ाज़ली
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कभी तजरबा किया जाए!
कहा गया है सितारों को छूना मुश्किल है, ये कितना सच है कभी तजरबा किया जाए| निदा फ़ाज़ली