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दिल का अजीब हाल था!
उसको न पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था, अब जो पलट के देखिए बात थी कुछ मुहाल भी| परवीन शाकिर
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दिल तो चमक सकेगा क्या!
दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लें, शीशा-गिरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी| परवीन शाकिर
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गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी!
सबसे नज़र बचा के वो मुझको कुछ ऐसे देखता, एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी| परवीन शाकिर
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उस पे तिरा जमाल भी!
बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की, चाँद भी ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी| परवीन शाकिर
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कुछ था तिरा ख़याल भी!
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी, दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी| परवीन शाकिर
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निर्बीज क्यों हो चले हम!
आज मैं एक बार फिर हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम ठाकुर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत– इस तरह निर्बीज -सेक्यों हो चले हम आजहरियल घास…