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ख़िज़ाँ हमारी तरफ़!
बिछड़ते वक़्त वो तक़्सीम कर गया मौसम, बहार उसकी तरफ़ है ख़िज़ाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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कुआँ हमारी तरफ़!
खड़े हैं प्यासे अना के इसी भरोसे पर, कि चल के आएगा इक दिन कुआँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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न जाँ हमारी तरफ़!
न जिस्म साथ हमारे न जाँ हमारी तरफ़, है कुछ भी हम में हमारा कहाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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वसंतागमन!
आज एक बार फिर से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के एक प्रमुख हिन्दी कवि स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनको अपनी रचनाओं के लिए सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य वाचस्पति सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी की…
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न जिसका नाम है कोई
न जिसका नाम है कोई न जिस की शक्ल है कोई, इक ऐसी शय का क्यूँ हमें अज़ल से इंतिज़ार है| शहरयार
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हर एक दिल फ़िगार है!
हर एक जिस्म रूह के अज़ाब से निढाल है, हर एक आँख शबनमी हर एक दिल फ़िगार है| शहरयार
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ग़ुबार ही ग़ुबार है!
ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है, हद-ए-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है| शहरयार
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दरिया उतर गया यारो!
भटक रही थी जो कश्ती वो ग़र्क़-ए-आब हुई, चढ़ा हुआ था जो दरिया उतर गया यारो| शहरयार