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हर नक़्श तमन्ना का!
हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुँधला, हर एक ज़ख़्म मिरे दिल का भर गया यारो| शहरयार
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निर्विकल्प!
आज शायद पहली बार मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के एक प्रमुख हिन्दी कवि स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनको अपनी रचनाओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की यह कविता…
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हुस्न की दहशत अजब
हुस्न की दहशत अजब थी वस्ल की शब में ‘मुनीर’, हाथ जैसे इंतिहा-ए-शौक़ से शल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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और बोझल हो गया!
अब कहाँ होगा वो और होगा भी तो वैसा कहाँ, सोच कर ये बात जी कुछ और बोझल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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शाम रंगों में ढली!
मैं अकेला और सफ़र की शाम रंगों में ढली, फिर ये मंज़र मेरी नज़रों से भी ओझल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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शहर जल-थल हो गया
वो हवा थी शाम ही से रस्ते ख़ाली हो गए, वो घटा बरसी कि सारा शहर जल-थल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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चाँद ने पानी में देखा!
अपनी ही तेग़-ए-अदा से आप घायल हो गया, चाँद ने पानी में देखा और पागल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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कहीं चला भी गया!
चलो ‘मुनीर’ चलें अब यहाँ रहें भी तो क्या, वो संग-दिल तो यहाँ से कहीं चला भी गया| मुनीर नियाज़ी
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हिना की ख़ुशबू थी!
हवा थी गहरी घटा थी हिना की ख़ुशबू थी, ये एक रात का क़िस्सा लहू रुला भी गया| मुनीर नियाज़ी