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हर इक सूरत!
हर इक सूरत भली लगती है कुछ दिन, लहू की शो’बदा-कारी* से बचिए| *मंत्रमुग्ध करना निदा फ़ाज़ली
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याद तुम्हारी!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर श्री माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| माहेश्वर जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत – याद तुम्हारी जैसे कोईकंचन-कलश भरे।जैसे कोई किरन अकेलीपर्वत…
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ये किस मक़ाम पे!
ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया ज़माने ने, कि अब हयात पे तेरा भी इख़्तियार नहीं| साहिर लुधियानवी
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मौत नागवार नहीं!
गुरेज़ का नहीं क़ाइल हयात से लेकिन, जो सच कहूँ कि मुझे मौत नागवार नहीं| साहिर लुधियानवी
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ए’तिबार नहीं!
तुम्हारे अहद-ए-वफ़ा को मैं अहद क्या समझूँ, मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत पे ए’तिबार नहीं| साहिर लुधियानवी
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ख़ुश-गवार नहीं!
अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब, अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं| साहिर लुधियानवी
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हमीं से रंग-ए-बहार!
हमीं से रंग-ए-गुलिस्ताँ हमीं से रंग-ए-बहार, हमीं को नज़्म-ए-गुलिस्ताँ पे इख़्तियार नहीं| साहिर लुधियानवी