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पनघट!
आज फिर से मैं देश के एक प्रमुख व्यंग्य लेखक स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता गाँव के पनघट का सुंदर चित्र है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की यह कविता – ग्राम अलका अप्सराएँपनघट पर नीर भरे! सुन्दर सजीले अंगअचल हिले खुले पंखवस्त्र कसे,…
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हमसे दश्त की आबादी
हमसे नाम जुनूँ का क़ाइम हमसे दश्त की आबादी, हमसे दर्द का शिकवा करते हमको ज़ख़्म दिखाते हो| इब्न-ए-इंशा
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भोले भी बन जाते हो!
बेकल बेकल रहते हो पर महफ़िल के आदाब के साथ, आँख चुराकर देख भी लेते भोले भी बन जाते हो| इब्न-ए-इंशा
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वहशत में उलझाते हो!
सुनते हैं फिर छुप छुप उनके घर में आते जाते हो, ‘इंशा’ साहब नाहक़ जी को वहशत में उलझाते हो| इब्न-ए-इंशा
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इतने चेहरे इतने लोग!
इस बस्ती में इतने घर थे इतने चेहरे इतने लोग, और किसी के दर पे न पहुँचा ऐसा होश दिवाने में| इब्न-ए-इंशा
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इस सारे अफ़्साने में!
किसका किसका हाल सुनाया तूने ऐ अफ़्साना-गो, हमने एक तुझी को ढूँडा इस सारे अफ़्साने में| इब्न-ए-इंशा