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बेताबियाँ, अंगड़ाइयाँ!
क्या ज़माने में यूँ ही कटती है रात, करवटें, बेताबियाँ, अंगड़ाइयाँ| कैफ़ भोपाली
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दोपहर का समय था तब – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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वक़्त का मारा लगता है
‘कैफ़’ वो कल का ‘कैफ़’ कहाँ है आज मियाँ, ये तो कोई वक़्त का मारा लगता है| कैफ़ भोपाली
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फूल कँवारा लगता है!
तितली चमन में फूल से लिपटी रहती है, फिर भी चमन में फूल कँवारा लगता है| कैफ़ भोपाली
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इतना बेचारा लगता है!
किसको ख़बर ये कितनी क़यामत ढाता है, ये लड़का जो इतना बेचारा लगता है| कैफ़ भोपाली