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बाज़ार तो ऊँचा करें!
चढ़ के सूली पर ख़रीदेंगे ख़रीदार आपको, आप अपने हुस्न का बाज़ार तो ऊँचा करें| नज़ीर बनारसी
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हुस्न तो पैदा करें!
हुस्न ख़ुद आए तवाफ़-ए-इश्क़ करने के लिए, इश्क़ वाले ज़िंदगी में हुस्न तो पैदा करें| नज़ीर बनारसी
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दरिया दूसरा पैदा करें!
दूसरों से कब तलक हम प्यास का शिकवा करें, लाओ तेशा एक दरिया दूसरा पैदा करें| नज़ीर बनारसी
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ऐसा करें वैसा करें!
ये करें और वो करें ऐसा करें वैसा करें, ज़िंदगी दो दिन की है दो दिन में हम क्या क्या करें| नज़ीर बनारसी
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साँसों का हिसाब!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय सुमन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की यह कविता – तुम जो जीवित कहलाने के हो आदीतुम जिसको दफ़ना…
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न समझ सकें तो पानी!
मिरी बे-ज़बान आँखों से गिरे हैं चंद क़तरे, वो समझ सकें तो आँसू न समझ सकें तो पानी| नज़ीर बनारसी
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सँवर गई जवानी!
तिरा हुस्न सो रहा था मिरी छेड़ ने जगाया, वो निगाह मैंने डाली कि सँवर गई जवानी| नज़ीर बनारसी
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बरस चुका है पानी!
मिरा ग़म रुला चुका है तुझे बिखरी ज़ुल्फ़ वाले, ये घटा बता रही है कि बरस चुका है पानी| नज़ीर बनारसी
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ये कैसी बद-गुमानी!
नहीं मुझसे जब तअल्लुक़ तो ख़फ़ा ख़फ़ा से क्यूँ हैं, नहीं जब मिरी मोहब्बत तो ये कैसी बद-गुमानी| नज़ीर बनारसी
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ये बला की मेहरबानी!
ये इनायतें ग़ज़ब की ये बला की मेहरबानी, मेरी ख़ैरियत भी पूछी किसी और की ज़बानी| नज़ीर बनारसी