Category: Uncategorized
-
मंज़र तिरी आँखें!
अब तक मिरी यादों से मिटाए नहीं मिटता, भीगी हुई इक शाम का मंज़र तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
खुलती हैं बहुत दिल में
बोझल नज़र आती हैं ब-ज़ाहिर मुझे लेकिन, खुलती हैं बहुत दिल में उतर कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
अपनी गंध नहीं बेचूंगा!
आज मैं प्रसिद्ध हिन्दी कवि और राजनेता, स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| बैरागी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की यह कविता – चाहे सभी सुमन बिक जाएंचाहे ये उपवन बिक जाएंचाहे सौ फागुन बिक जाएंपर मैं…
-
गौहर तेरी आँखें!
ख़ाली जो हुई शाम-ए-ग़रीबाँ की हथेली, क्या क्या न लुटाती रहीं गौहर तेरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
बिछड़कर तिरी आँखें!
फिर कौन भला दाद-ए-तबस्सुम उन्हें देगा, रोएँगी बहुत मुझ से बिछड़कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
समुंदर तिरी आँखें!
भड़काएँ मिरी प्यास को अक्सर तिरी आँखें, सहरा मिरा चेहरा है समुंदर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी