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अबरू की कटारी!
इस दिल में अभी और भी ज़ख़्मों की जगह है, अबरू* की कटारी को दो आब और ज़ियादा| *भौं हसरत जयपुरी
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महफ़िल में सितमगर!
क्या बात है जाने तिरी महफ़िल में सितमगर, धड़के है दिल-ए-ख़ाना-ख़राब और ज़ियादा| हसरत जयपुरी
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गुलाब और ज़ियादा!
छलके तिरी आँखों से शराब और ज़ियादा, खिलते रहें होंठों के गुलाब और ज़ियादा| हसरत जयपुरी
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बुराई तो नहीं माँगी थी!
अपने बीमार पे इतना भी सितम ठीक नहीं, तेरी उल्फ़त में बुराई तो नहीं माँगी थी| हसरत जयपुरी
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पराई तो नहीं माँगी!
मेरा हक़ था तिरी आँखों की छलकती मय पर, चीज़ अपनी थी पराई तो नहीं माँगी थी| हसरत जयपुरी
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खुदाई तो नहीं माँगी थी
मैंने क्या जुर्म किया आप ख़फ़ा हो बैठे, प्यार माँगा था खुदाई तो नहीं माँगी थी| हसरत जयपुरी
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रिहाई तो नहीं माँगी थी
तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी, क़ैद माँगी थी रिहाई तो नहीं माँगी थी| हसरत जयपुरी
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मिरे साथ साथ चलकर!
मिरी तेज़-गामियों से नहीं बर्क़ को भी निस्बत, कहीं खो न जाए दुनिया मिरे साथ साथ चल कर| शकील बदायूनी