Category: Uncategorized
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फेंक गई है धानों पर!
बरखा की तो बात ही छोड़ो चंचल है पुर्वाई भी, जाने किस का सब्ज़ दुपट्टा फेंक गई है धानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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पुराना किला!
आज एक बार मैं हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार और धर्मयुग पत्रिका यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक लंबी कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता का रचना काल चीन से युद्ध के बाद का समय है जब नेहरू जी का स्वप्न भंग हो गया था, वे पक्षाघात से पीड़ित थे और राजनीतिज्ञों…
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साड़ी की दूकानों पर!
आज भी जैसे शाने पर तुम हाथ मिरे रख देती हो, चलते चलते रुक जाता हूँ साड़ी की दूकानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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घर के रौशनदानों पर!
आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर, उसका काग़ज़ चिपका देना घर के रौशन-दानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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रुस्वा हो सा जाता हूँ!
तुझे बाँहों में भर लेने की ख़्वाहिश यूँ उभरती है, कि मैं अपनी नज़र में आप रुस्वा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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प्यासा हो सा जाता हूँ!
तिरे गुल-रंग होंटों से दहकती ज़िंदगी पीकर, मैं प्यासा और प्यासा और प्यासा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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झूटा हो सा जाता हूँ!
मैं चाहे सच ही बोलूँ हर तरह से अपने बारे में, मगर तुम मुस्कुराती हो तो झूटा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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तन्हा हो सा जाता हूँ!
मैं तुम से दूर रहता हूँ तो मेरे साथ रहती हो, तुम्हारे पास आता हूँ तो तन्हा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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अपना हो सा जाता हूँ!
मुझे मालूम है मैं सारी दुनिया की अमानत हूँ, मगर वो लम्हा जब मैं सिर्फ़ अपना हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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कलम और कुदाली!
आज एक बार मैं हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी ने साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान किया है| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता…