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हम जंगल के जोगी!
हम जंगल के जोगी हम को एक जगह आराम कहाँ, आज यहाँ कल और नगर में सुब्ह कहाँ और शाम कहाँ| इब्न-ए-इंशा
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आलम एक शहीद!
हाँ उसने झलकी दिखलाई एक ही पल को दरीचे में, जानो इक बिजली लहराई आलम एक शहीद हुआ| इब्न-ए-इंशा
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दर्द शदीद हुआ!
आन के इस बीमार को देखे तुझको भी तौफ़ीक़* हुई, लब पर उसके नाम था तेरा जब भी दर्द शदीद** हुआ| *हिम्मत , **तेज इब्न-ए-इंशा
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कब ना-उम्मीद हुआ!
आज तो जानी रस्ता तकते शाम का चाँद पदीद हुआ*, तूने तो इंकार किया था दिल कब ना-उम्मीद हुआ| *उदित हो गया इब्न-ए-इंशा
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ताबिश में ख़ुर्शीद हुआ!
देख हमारी दीद के कारन कैसा क़ाबिल-ए-दीद हुआ, एक सितारा बैठे बैठे ताबिश में ख़ुर्शीद* हुआ| *तपते-तपते सूरज बन गया इब्न-ए-इंशा
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सांझ!
आज मैं हिन्दी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| त्यागी जी ने व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में तो विशेष ख्याति प्राप्त की ही थी, उन्होंने बहुत सी सुंदर कविताएं भी लिखी थीं| त्यागी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत…
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उस शख़्स का भी!
वो शख़्स जो दीवानों की इज़्ज़त नहीं करता, उस शख़्स का भी चाक गरेबान किया जाए| क़तील शिफ़ाई
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ये एलान किया जाए!
मुफ़्लिस के बदन को भी है चादर की ज़रूरत, अब खुल के मज़ारों पे ये एलान किया जाए| क़तील शिफ़ाई
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उसे क़ुर्बान किया जाए!
हर शय से मुक़द्दस* है ख़यालात का रिश्ता, क्यूँ मस्लहतों** पर उसे क़ुर्बान किया जाए| *पवित्र , **सलाह क़तील शिफ़ाई