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आषाढ़ का पहला दिवस!
आज फिर से मैं, अपने समय में मंचों के विशिष्ट कवि रहे स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की ये पंक्तियाँ हमारे पूर्व प्रधानमंत्री और स्वयं अच्छे कवि रहे स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी अक्सर दोहराते थे- हार में या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं, संघर्ष…
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मिरी वहशत का सबब!
मुझ से क्या पूछ रहे हो मिरी वहशत का सबब, बू-ए-आवारा से पूछो कि भटकती क्यूँ है| शहरयार
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बात खटकती क्यूँ है!
तुझ से मिल कर भी न तन्हाई मिटेगी मेरी, दिल में रह रह के यही बात खटकती क्यूँ है| शहरयार
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बेगाना समझती क्यूँ है!
मुझको अपना न कहा इस का गिला तुझ से नहीं, इसका शिकवा है कि बेगाना समझती क्यूँ है| शहरयार
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रंग बदलती क्यूँ है!
जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है, ज़िंदगी रोज़ नए रंग बदलती क्यूँ है| शहरयार
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अंदर जाकर देख!
तू भी ‘मुनीर’ अब भरे जहाँ में मिल कर रहना सीख, बाहर से तो देख लिया अब अंदर जाकर देख| मुनीर नियाज़ी
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नक़्श बना कर देख!
शायद कोई देखने वाला हो जाए हैरान, कमरे की दीवारों पर कोई नक़्श बना कर देख| मुनीर नियाज़ी
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पास बुला कर देख!
दरवाज़े के पास आ आ कर वापस मुड़ती चाप, कौन है इस सुनसान गली में पास बुला कर देख| मुनीर नियाज़ी
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गाँव का परिचय!
आज एक बार फिर से मैं, अपनी अलग किस्म की रचनाओं के माध्यम से किसी समय हिन्दी काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| निर्धन जी की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं- एक पुराने दुख ने पूछा, क्या तुम अभी वहीं रहते हो, उत्तर दिया चले…
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दिया जला कर देख!
शाम है गहरी तेज़ हवा है सर पे खड़ी है रात, रस्ता गए मुसाफ़िर का अब दिया जला कर देख| मुनीर नियाज़ी