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शब पहनाई भी!
कितनी जल्दी मैली करता है पोशाकें रोज़ फ़लक, सुब्ह ही रात उतारी थी और शाम को शब पहनाई भी| गुलज़ार
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पवन सामने है !
आज मैं हिन्दी के एक प्रमुख गीतकार और विशिष्ट कवि स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की अधिक रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह गीत – पवन सामने है नहीं गुनगुनानासुमन ने कहा पर भ्रमर ने…
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आपका इक सौदाई भी
दो दो शक्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में, मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी| गुलज़ार
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माज़ी की रुस्वाई भी!
यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं, सोंधी सोंधी लगती है तब माज़ी की रुस्वाई भी| गुलज़ार
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मैं भी था तन्हाई भी!
काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी, तीनों थे हम वो भी थे और मैं भी था तन्हाई भी| गुलज़ार
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कैसे मिलाता है मुझे!
तेरा मुंकिर* नहीं ऐ वक़्त मगर देखना है, बिछड़े लोगों से कहाँ कैसे मिलाता है मुझे| *न मानने वाला शहरयार
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हौल सा आता है मुझे!
मेरी इन आँखों को ख़्वाबों से पशेमानी है, नींद के नाम से जो हौल सा आता है मुझे| शहरयार
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कौन बुलाता है मुझे!
रात का वक़्त है सूरज है मिरा राह-नुमा, देर से दूर से ये कौन बुलाता है मुझे| शहरयार
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क्या नज़र आता है मुझे
दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे, फिर भी इक शख़्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे| शहरयार