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इतना भी न घबराओ!
इतना भी न घबराओ नई तर्ज़-ए-अदा से, हर दौर में बदले हुए उस्लूब* रहे हैं| *व्यवहार जाँ निसार अख़्तर
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अल्फ़ाज़ में इज़हार!
अल्फ़ाज़ में इज़हार-ए-मोहब्बत के तरीक़े, ख़ुद इश्क़ की नज़रों में भी मायूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर
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कुछ और भी चेहरे!
हम भी तिरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन, कुछ और भी चेहरे हमें मर्ग़ूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर
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जो दर्द किसी नाम से!
उनको न पुकारो ग़म-ए-दौराँ के लक़ब* से, जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं| *Name जाँ निसार अख़्तर
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लगता है सफ़ीने से!
तूफ़ान की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन, लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर
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वो लोग ही हर दौर में!
वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं, जो इश्क़ में तालिब* नहीं मतलूब** रहे हैं| *Who Desires, **Who Is Desired जाँ निसार अख़्तर
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बँसबिट्टी में!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह गीत – बँसबिट्टी में कोयल बोलेमहुआ डाल महोखाआया कहाँ बसन्त इधर हैतुम्हें…
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तिरी नज़र का दिलों से!
ये और बात कि हर छेड़ ला-उबाली थी, तिरी नज़र का दिलों से मोआमला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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फ़ासला तो रहा!
मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में, बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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मुक़ाबला तो रहा!
चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी, तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर