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रिश्तों की पैमाइश पर!
फ़ासले हैं भी और नहीं भी नापा तौला कुछ भी नहीं, लोग ब-ज़िद रहते हैं फिर भी रिश्तों की पैमाइश पर| गुलज़ार
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ओस पड़ी थी रात!
ओस पड़ी थी रात बहुत और कोहरा था गर्माइश पर, सैली सी ख़ामोशी में आवाज़ सुनी फ़रमाइश पर| गुलज़ार
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दिया जलता रहा!
सभी को 75 वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई| आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों पर तथा हिन्दी फिल्मों में अपने गीतों के माध्यम से अनूठी पहचान बने स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|…
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आवाज़ भी दोहराते हुए
सी लिए होंट वो पाकीज़ा निगाहें सुन कर, मैली हो जाती है आवाज़ भी दोहराते हुए| गुलज़ार
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आवाज़ ही दे लेते!
हसरतें अपनी बिलक्तीं न यतीमों की तरह, हम को आवाज़ ही दे लेते ज़रा जाते हुए| गुलज़ार
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ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी!
मैं न हूँगा तो ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी, शोख़ पत्ते ने कहा शाख़ से मुरझाते हुए| गुलज़ार
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हम ने तो रात को!
हम ने तो रात को दाँतों से पकड़ कर रक्खा, छीना-झपटी में उफ़ुक़ खुलता गया जाते हुए| गुलज़ार
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कुछ भँवर डूब गए!
तुझ को देखा है जो दरिया ने इधर आते हुए, कुछ भँवर डूब गए पानी में चकराते हुए| गुलज़ार
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प्रबल झंझावात साथी!
आज एक बार फिर से मैं किसी समय हिन्दी गीत की पहचान बने स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| बच्चन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का यह गीत – प्रबल झंझावात, साथी! देह पर अधिकार हारे,विवशता…
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इतना भी न घबराओ!
इतना भी न घबराओ नई तर्ज़-ए-अदा से, हर दौर में बदले हुए उस्लूब* रहे हैं| *व्यवहार जाँ निसार अख़्तर