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बदन की गुनगुनाहट तो सुनो!
उस नज़र की उस बदन की गुनगुनाहट तो सुनो, एक सी होती है हर इक रागनी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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आवारगी ये मत कहो!
जिस्म की हर बात है आवारगी ये मत कहो, हम भी कर सकते हैं ऐसी शायरी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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ज़ुल्फ़ के ख़म याद आ गए!
सुलझाईं जब भी ज़ीस्त की ‘साग़र’ ने गुत्थियाँ, नागाह तेरी ज़ुल्फ़ के ख़म याद आ गए| साग़र ख़य्यामी
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तो हम याद आ गए!
मुद्दत हुई है बिछड़े हुए अपने-आप से, देखा जो आज तुम को तो हम याद आ गए| साग़र ख़य्यामी
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इतिहास का पर्चा!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ हास्य व्यंग्य कवि स्वर्गीय ओम प्रकाश आदित्य जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय ओम प्रकाश आदित्य जी की यह कविता – इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिंता से हृदय धड़कता थाथे…
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दीदा-ए-नम याद आ गए!
परदेस में जो आई नज़र नर्गिसी निगाह, इक बा-वफ़ा के दीदा-ए-नम याद आ गए| साग़र ख़य्यामी
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कि हम याद आ गए!
लिक्खा था तुम ने ख़त में कि तुम ने भुला दिया, क्या हादसा हुआ है कि हम याद आ गए| साग़र ख़य्यामी
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ख़्वाब बहम याद आ गए!
देखीं हैं जब भी गुल के क़रीं चंद तितलियाँ, कितने ख़याल-ओ-ख़्वाब बहम याद आ गए| साग़र ख़य्यामी
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रंज-ओ-अलम याद आ गए!
जब भी कहीं से प्यार मिला या ख़ुशी मिली, दुनिया के दर्द-ओ-रंज-ओ-अलम याद आ गए| साग़र ख़य्यामी