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अपनी खिड़की से!
आज एक बार फिर मैं, हिन्दी के आधुनिक कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक वाजपेयी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता – मैं अपनी खिड़की से पुकारना चाहता हूँकि सामने के चर्च मेंप्रार्थनाओं…
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तुझे जब याद करते हैं!
न जानी क़द्र तेरी उम्र-ए-रफ़्ता हम ने कॉलेज में,निकल आते हैं आँसू अब तुझे जब याद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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वही शागिर्द हैं जो!
अदब ता’लीम का जौहर है ज़ेवर है जवानी का,वही शागिर्द हैं जो ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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हमेशा भूलते जाते हैं!
सबक़ उम्र-ए-रवाँ का दिल-नशीं होने नहीं पाता,हमेशा भूलते जाते हैं जो कुछ याद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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नज़र आती है दुनिया!
नज़र आती है दुनिया इक इबादत-गाह-ए-नूरानी,सहर का वक़्त है बंदे ख़ुदा को याद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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दिल-ए-नाशाद रोता!
दिल-ए-नाशाद रोता है ज़बाँ उफ़ कर नहीं सकती,कोई सुनता नहीं यूँ बे-नवा फ़रियाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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थके-माँदे मुसाफ़िर!
थके-माँदे मुसाफ़िर ज़ुल्मत-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ में,बहार-ए-जल्वा-ए-सुब्ह-ए-वतन को याद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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ये तारे रौशनी अपनी!
नहीं घटती मिरी आँखों में तारीकी शब-ए-ग़म की,ये तारे रौशनी अपनी अबस बरबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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छूटा-गाँव, छूटी गली!
आज एक बार फिर मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में एक गरीब और अशिक्षित कन्या के मन में पैदा होने वाली आशंकाएं अभिव्यक्त की गई हैं, जिसे विवाह होने पर अनजान क्षेत्र में जाना पड़ता है| चक्रधर जी…
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जन्नत इसी दुनिया में!
मोहब्बत के चमन में मजमा-ए-अहबाब रहता है, नई जन्नत इसी दुनिया में हम आबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण