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ख़्वाब बन कर तिरी!
मैं ने जिस लम्हे को पूजा है उसे बस इक बार,ख़्वाब बन कर तिरी आँखों में उतरता देखूँ| परवीन शाकिर
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फूल की तरह मिरे!
फूल की तरह मिरे जिस्म का हर लब खुल जाए,पंखुड़ी पंखुड़ी उन होंटों का साया देखूँ| परवीन शाकिर
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मुझ पे छा जाए वो!
मुझ पे छा जाए वो बरसात की ख़ुश्बू की तरह,अंग अंग अपना इसी रुत में महकता देखूँ| परवीन शाकिर
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एक बच्चे की तरह से!
सब ज़िदें उस की मैं पूरी करूँ हर बात सुनूँ,एक बच्चे की तरह से उसे हँसता देखूँ| परवीन शाकिर
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हर रोज़ तमाशा देखूँ!
बंद कर के मिरी आँखें वो शरारत से हँसे,बूझे जाने का मैं हर रोज़ तमाशा देखूँ| परवीन शाकिर
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जाने क्यूँ तेरे लिए!
तू मिरा कुछ नहीं लगता है मगर जान-ए-हयात,जाने क्यूँ तेरे लिए दिल को धड़कना देखूँ| परवीन शाकिर
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काश संदल से मिरी!
काश संदल से मिरी माँग उजाले आ कर,इतने ग़ैरों में वही हाथ जो अपना देखूँ| परवीन शाकिर
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दिल, मेरी कायनात अकेली है—और मैं !
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। शमशेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयरकी हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की यह कविता – दिल, मेरी कायनात अकेली है—और मैं !बस अब ख़ुदा की जात अकेली है, और मैं !…
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याद में तन्हा देखूँ!
एक इक कर के मुझे छोड़ गईं सब सखियाँ,आज मैं ख़ुद को तिरी याद में तन्हा देखूँ| परवीन शाकिर
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भूलने वाले मैं कब!
शाम भी हो गई धुँदला गईं आँखें भी मिरी,भूलने वाले मैं कब तक तिरा रस्ता देखूँ| परवीन शाकिर