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एक झोंका था कि !
मैं कि सहरा-ए-मोहब्बत का मुसाफ़िर था ‘फ़राज़’,एक झोंका था कि ख़ुश्बू के सफ़र पर निकला| अहमद फ़राज़
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तिरा लश्कर निकला!
तू यहीं हार गया है मिरे बुज़दिल दुश्मन,मुझ से तन्हा के मुक़ाबिल तिरा लश्कर निकला| अहमद फ़राज़
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वही ख़ंजर निकला!
शहर-वालों की मोहब्बत का मैं क़ाएल हूँ मगर,मैं ने जिस हाथ को चूमा वही ख़ंजर निकला| अहमद फ़राज़
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सूनी सांझ!
आज मैं विख्यात हिंदी कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। सुमन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयरकी हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की यह कविता – बहुत दिनों में आज मिली हैसाँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम। पेड खडे फैलाए…
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जब कोई फूल मिरी!
मैं ने उस जान-ए-बहाराँ को बहुत याद किया,जब कोई फूल मिरी शाख़-ए-हुनर पर निकला| अहमद फ़राज़
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दरिया भी मुझी में डूबे!
था जिन्हें ज़ो’म वो दरिया भी मुझी में डूबेमैं कि सहरा नज़र आता था समुंदर निकला अहमद फ़राज़
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मैं तो मक़्तल में भी!
मैं तो मक़्तल में भी क़िस्मत का सिकंदर निकलाक़ुरआ-ए-फ़ाल मिरे नाम का अक्सर निकला अहमद फ़राज़
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कुछ अपने दिल की!
कुछ अपने दिल की ख़ू* का भी शुक्राना चाहिए,सौ बार उन की ख़ू का गिला कर चुके हैं हम|*Nature फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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फीका है अब भी रंग!
उन की नज़र में क्या करें फीका है अब भी रंग,जितना लहू था सर्फ़-ए-क़बा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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रहबर से अपनी राह!
अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें,रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़