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ये मुल्क-ए-जवानी है!
ऐ पीर-ए-ख़िरद-मंदाँ दिल की भी ज़रूरत है,ये शहर-ए-ग़ज़ालाँ है ये मुल्क-ए-जवानी है| बशीर बद्र
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ठहरा हुआ दरिया है!
दिल से जो छटे बादल तो आँख में सावन है,ठहरा हुआ दरिया है बहता हुआ पानी है| बशीर बद्र
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ग़म में वो रवानी है!
पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है,ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है| बशीर बद्र
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यहाँ से तेरे मिरे!
ये एक पेड़ है आ इस से मिल के रो लें हम,यहाँ से तेरे मिरे रास्ते बदलते हैं| बशीर बद्र
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घने धुएँ में फ़रिश्ते भी!
घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँख मलते हैं,तमाम रात खुजूरों के पेड़ जुलते हैं| बशीर बद्र
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आदमी खजूर हो गए!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ पत्रकार और कवि स्वर्गीय तारादत्त निर्विरोध जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। तारादत्त निर्विरोध जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय तारादत्त निर्विरोध जी की यह ग़ज़ल – आदमी खजूर हो गएदूर और दूर हो गए कल मिले इनाम जो हमेंआज…
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सीपियों में पलते हैं!
उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं, ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं| बशीर बद्र