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मुझे तू ढाल दे ऐसे!
मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में,मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो’तबर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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अगर मैं छू लूँ !
बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में,अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मैं अपने झुण्ड से!
मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा, मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मैं चाहता हूँ कि!
मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे,मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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अगर वो छोड़ दे!
ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है,अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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दर-ब-दर हो जाऊँ!
मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ,मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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तुम ने जो तोड़ दिए!
तुम ने जो तोड़ दिए ख़्वाब हम उन के बदले,कोई क़ीमत कभी लेते तो ख़ुदाई लेते| राहत इंदौरी
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अँधेरों से कमाई लेते!
चाँद रातों में हमें डसता है दिन में सूरज,शर्म आती है अँधेरों से कमाई लेते| राहत इंदौरी
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हमदर्दों का ये दर्द!
कितना मानूस सा हमदर्दों का ये दर्द रहा,इश्क़ कुछ रोग नहीं था जो दवाई लेते| राहत इंदौरी