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बाद में बरसा करना!
उन को याँ वादे पे आ लेने दे ऐ अब्र-ए-बहार,जिस क़दर चाहना फिर बाद में बरसा करना। हसरत मोहानी
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कुछ भी दुश्वार न था!
इक नज़र भी तिरी काफ़ी थी प-ए-राहत-ए-जाँ,कुछ भी दुश्वार न था मुझ को शकेबा करना। हसरत मोहानी
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देखना भी तो उन्हें!
देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना,शेवा-ए-इश्क़ नहीं हुस्न को रुस्वा करना। हसरत मोहानी
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कौवे-1
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री नरेश सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नरेश जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नरेश सक्सेना जी की यह कविता – हमारे शहर के कौवे केंचुए खाते हैंआपके शहर के क्या खाते हैं कोई थाली नहीं…
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जन्नत पुकारती है!
जन्नत पुकारती है कि मैं हूँ तिरे लिए, दुनिया ब-ज़िद है मुझ से कि जन्नत करो मुझे| मुनव्वर राना
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पानी ने कब कहा था!
मैं ने तो तुम से की ही नहीं कोई आरज़ू,पानी ने कब कहा था कि शर्बत करो मुझे| मुनव्वर राना
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मिट्टी की सूरत करो!
फिर से बदल के मिट्टी की सूरत करो मुझे,इज़्ज़त के साथ दुनिया से रुख़्सत करो मुझे| मुनव्वर राना
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सुनो हवाओ अगर मैं!
बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना,सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मुझे तू ढाल दे ऐसे!
मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में,मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो’तबर हो जाऊँ| मुनव्वर राना