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जगा रहा है ज़माना!
जगा रहा है ज़माना मगर नहीं खुलतीं,कहाँ की नींद इन आँखों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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रत्नदीप!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की यह कविता – इस नीले सिंधु तीर, एक शामगीला एकान्त देखआँख डबडबाई थीऔर व्यथा की नन्ही जल चिड़ियामुझसे कुछ बोली थी…
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चाय जैसी भी हो!
शे’र जैसा भी हो इस शहर में पढ़ सकते हो,चाय जैसी भी हो आसाम में बिक जाती है| मुनव्वर राना
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सल्तनत तक मिरे!
आप क्या मुझ को नवाज़ेंगे जनाब-ए-आली,सल्तनत तक मिरे इनआ’म में बिक जाती है| मुनव्वर राना
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आराम में बिक जाती!
छाँव मिल जाए तो कम दाम में बिक जाती है,अब थकन थोड़े से आराम में बिक जाती है| मुनव्वर राना