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अनुभूति!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि तथा छायावाद युग के एक स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। पंत जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – तुम आती हो,नव अंगों काशाश्वत मधु-विभव लुटाती हो। बजते नि:स्वर…
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उदासी कमरे के!
तुझे मैं कैसे बताऊँ कि शाम होते ही,उदासी कमरे के ताक़ों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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चलो कि धूप दरीचों!
उठो कि ओस की बूँदें जगा रही हैं तुम्हें,चलो कि धूप दरीचों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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हमारी उम्र खिलौनों!
नहीं थी दूसरी कोई जगह भी छुपने की,हमारी उम्र खिलौनों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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कि शाहज़ादी ग़ुलामों!
तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू है यही,कि शाहज़ादी ग़ुलामों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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तमाम गर्द किताबों में!
तमाम तल्ख़ियाँ साग़र में रक़्स करने लगीं,तमाम गर्द किताबों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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वो फ़ाख़्ता जो मुझे!
वो फ़ाख़्ता जो मुझे देखते ही उड़ती थी,बड़े सलीक़े से बच्चों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना