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जाड़े की धूप!
एक बार फिर से आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। सर्वेश्वर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता– बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया ताते जल नहा पहन श्वेत वसन…
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कि मैं तो ख़ुशबू था!
बिखर के जाता कहाँ तक कि मैं तो ख़ुशबू था,हवा चली थी मुझे अपने हम-रिकाब लिए| नज़ीर क़ैसर
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तू ढूँडने मुझे निकला !
मैं एक ढलता सा साया ज़मीं के क़दमों में,तू ढूँडने मुझे निकला है आफ़्ताब लिए| नज़ीर क़ैसर
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सर-फिरी मौजें अभी!
कौन ये पाताल से उभरा किनारे पर ‘सलीम’,सर-फिरी मौजें अभी तक दाएरों में क़ैद हैं| सलीम कौसर
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ख़ाक उड़ती है हवा!
इस जज़ीरे पर अज़ल से ख़ाक उड़ती है हवा,मंज़िलों के भेद फिर भी रास्तों में क़ैद हैं| सलीम कौसर
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फैल जाएँगे जो तूफ़ाँ !
ये ज़मीं यूँही सिकुड़ती जाएगी और एक दिन,फैल जाएँगे जो तूफ़ाँ साहिलों में क़ैद हैं| सलीम कौसर