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वे हवाएं खो गई हैं!
आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- साथ लेकर मैं कभी जिनको चला था, रास्ते में वे हवाएं खो गई हैं। वे सुकोमल भाव के स्वप्निल बिछौने कूदते वे सृजन के मदमस्त छौने, सफलता की राह पर आगे बढे़ तब सिरफिरी परिकल्पनाएं खो गई हैं। पेट की खातिर यहाँ जीवन जिए हैं…
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टूटता रहता हूँ हर गाम!
मेरी दीवार को तू कितना सँभालेगा ‘शकील’,टूटता रहता हूँ हर गाम मिरे साथ न चल| शकील आज़मी
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टपके हुए आँसू की तरह!
तू भी खो जाएगी टपके हुए आँसू की तरह,देख ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मिरे साथ न चल| शकील आज़मी
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मैं हूँ इक धूल भरी शाम!
तू नई सुबह के सूरज की है उजली सी किरन,मैं हूँ इक धूल भरी शाम मिरे साथ न चल| शकील आज़मी
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तू भी हो जाएगा बदनाम!
मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल,तू भी हो जाएगा बदनाम मिरे साथ न चल| शकील आज़मी
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ज़िंदगी नाम है !
हर नफ़स उम्र-ए-गुज़िश्ता की है मय्यत ‘फ़ानी’,ज़िंदगी नाम है मर मर के जिए जाने का| फ़ानी बदायुनी
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अचानक तुम आ जाओ!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री आलोक धन्वा जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। आलोक जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री आलोक धन्वा जी की यह कविता- इतनी रेलें चलती हैंभारत मेंकभीकहीं से भी आ सकती होमेरे पास कुछ दिन रहना इस घर मेंजो…