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सूरज किधर गया!
आज प्रस्तुत है एक और रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कई दिनों से देख रहा हूँसूरज किधर गया, कहीं राह में खेल रहा हैया अपने घर गया। बस्ता यहाँ पड़ा दिखता हैमार लगाऊंगावापस आ जाए फिर लंबी क्लास चलाऊंगा वर्षा का वह बना बहानाजाने किधर गया। अच्छा चलन नहीं दिखता हैउसका कुछ दिन सेइधर…
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ख़्वाबों को झुलसाएँगे!
इस जानिब हम उस जानिब तुम बीच में हाइल एक अलाव,कब तक हम तुम अपने अपने ख़्वाबों को झुलसाएँगे| बशर नवाज़
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अब मिल जाए मनाएँगे!
वो भी कोई हम ही सा मासूम गुनाहों का पुतला था, नाहक़ उस से लड़ बैठे थे अब मिल जाए मनाएँगे| बशर नवाज़
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अपने हँसते चेहरे!
चढ़ता दरिया एक न इक दिन ख़ुद ही किनारे काटेगा,अपने हँसते चेहरे कितने तूफ़ानों को छुपाएँगे| बशर नवाज़
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तुम भी तंग आ जाओगे!
रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे,तुम भी तंग आ जाओगे इक दिन हम भी उक्ता जाएँगे| बशर नवाज़