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चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले!
आपकी सेवा में अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज एक बार फिर मैं एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे लिखा था ज़नाब अमजद इस्लाम अमजद जी ने और गाया था जगजीत सिंह जी ने, इसके बोल हैं – चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले!लीजिए प्रस्तुत है ये ग़ज़ल धन्यवाद
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फूल थे बादल भी था!
फूल थे बादल भी था और वो हसीं सूरत भी थी,दिल में लेकिन और ही इक शक्ल की हसरत भी थी| मुनीर नियाज़ी
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मौसम की बात करेंगे!
प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- विषय आज कुछ नहीं सूझताफिर मौसम की बात करेंगे। मौसम के हम नहीं नियंताअक्सर उसके मारे रहतेकभी किसी हद तक भाता वहकभी प्रभाव दुधारे रहते, लेकिन उसके बारे में हमकुछ तो तहकीकात करेंगे। वैसे यह भी नहीं रहा अबऊपर वाले की मर्जी भरकुछ माहौल बना…
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उस आख़िरी नज़र में !
उस आख़िरी नज़र में अजब दर्द था ‘मुनीर’,जाने का उस के रंज मुझे उम्र भर रहा| मुनीर नियाज़ी
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दूरी का ये तिलिस्म!
गुज़री है क्या मज़े से ख़यालों में ज़िंदगी,दूरी का ये तिलिस्म बड़ा कारगर रहा| मुनीर नियाज़ी
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मेरी सदा हवा में!
मेरी सदा हवा में बहुत दूर तक गई,पर मैं बुला रहा था जिसे बे-ख़बर रहा| मुनीर नियाज़ी
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दिल जल रहा था!
दिल जल रहा था ग़म से मगर नग़्मा-गर रहा,जब तक रहा मैं साथ मिरे ये हुनर रहा| मुनीर नियाज़ी
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मेरे नाम से पहले!
सुनेगा जब ज़माना मेरी बर्बादी के अफ़्साने,तुम्हारा नाम भी आएगा मेरे नाम से पहले| क़तील शिफ़ाई
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गुज़रा ज़माना बचपन का!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज एक बार फिर मैं मुकेश जी का गाया बहुत प्यारा गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, गीत के बोल हैं- गुज़रा बचपन का, आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम आशा है आपको पसंद आएगा, धन्यवाद ।