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तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक श्रेष्ठ नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ – फैली है दूर तक परेशानी, तिनके सा तिरता हूँ तो क्या हैतुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं आशा है आपको पसंद आएगाधन्यवाद।
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नज़राना तेरे हुस्न को!
नज़राना तेरे हुस्न को क्या दें कि अपने पास,ले दे के एक दिल है सो टूटा हुआ सा है| शहरयार
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क्या हादिसा हुआ है !
क्या हादिसा हुआ है जहाँ में कि आज फिर,चेहरा हर एक शख़्स का उतरा हुआ सा है| शहरयार
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तुमसे अलग होकर!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि और समाचार पत्रिका दिनमान के संपादन से संबंधित रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता – तुमसे अलग होकर लगता…
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हर फूल अपनी शाख़!
गुलशन में इस तरह से कब आई थी फ़स्ल-ए-गुल,हर फूल अपनी शाख़ से टूटा हुआ सा है| शहरयार
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हमारी बे-हिसी पे!
हमारी बे-हिसी पे रोने वाला भी नहीं कोई,चलो जल्दी चलो फिर शहर को जलता हुआ देखें| शहरयार
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ये चाहा था कि मंज़र !
धुएँ के बादलों में छुप गए उजले मकाँ सारे,ये चाहा था कि मंज़र शहर का बदला हुआ देखें| शहरयार