Category: Uncategorized
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जो मिलता है, उसका दामन भीगा लगता है!
आज क़ैसर उल जाफरी जी की लिखी एक गज़ल याद आ रही है, जिसके कुछ शेर पंकज उधास जी ने बड़ी खूबसूरती से गाए हैं। वास्तव में उदासी की, अभावों की और प्यार के अभाव की और लगभग दीवानगी की स्थिति को इस गज़ल के शेरों में बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति दी गई है- दीवारों…
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ये तो कहो कौन हो तुम, कौन हो तुम!
आज फिर से मुझे अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है। जनकवि शैलेंद्र जी का लिखा यह गीत, 1962 में बनी फिल्म- आशिक़ के लिए मुकेश जी ने शंकर जयकिशन जी के संगीत निर्देशन में गाया था। इस फिल्म में राजकपूर एक सड़क छाप नायक बने हैं, जो संभ्रांत…
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अडिग- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…
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Our Great India- These Cheap Politicians!
Again it is my submission based on a weekly prompt, yes I am a bit late in submitting it, this time. The subject is ‘how we can stop terror attacks?’ I am sorry to say that there is not much which a common man can do to stop terror attacks. But yes, everybody needs to…
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44. रोशनी के साथ हंसिए बोलिये!
आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज गुड़गांव से, गोवा की तरफ रवानगी का ज़िक्र और फिर से कुछ पुरानी यादें ताज़ा करने का अवसर है। संक्रमण काल है, सामान जा चुका, अब अपने जाने की बारी है। ऐसे में भी मौका मिलने पर बात तो की जा सकती है। समय है…
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गोवा कार्निवाल
यह कहा जाता है कि जहाँ रहते हैं, वहाँ का गाना भी चाहिए! वैसे भी जहाँ इंसान रहता, वहाँ की विशेषताओं से वह परिचित होता ही है और कभी वहाँ के बारे में बात करने के लिए मज़बूर भी हो जाता है। पिछले डेढ़ वर्ष से पंजिम, गोवा में रह रहा हूँ। कम ही लिखा…
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चंपा का फूल
आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…
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43. रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना!
आज फिर प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- मैंने अपने शुरू केे ब्लॉग्स में बचपन से लेकर वर्ष 2010 तक, जबकि मेरे सेवाकाल का समापन एनटीपीसी ऊंचाहार में हुआ, तब तक अपने आसपास घटित घटनाओं को साक्षी भाव से देखने का प्रयास किया, जैसे चचा गालिब ने कहा था- बाज़ार से गुज़रा हूँ, खरीदार नहीं…
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इतना सा मेरापन!
आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…