Category: Uncategorized
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मारे तो सभी जाएँगे!
दर्द की हद से गुज़ारे तो सभी जाएँगे,जल्द या देर से मारे तो सभी जाएँगे| शकील आज़मी
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अब तो बदनामी से!
अब तो बदनामी से शोहरत का वो रिश्ता है कि लोग,नंगे हो जाते हैं अख़बार में रहने के लिए| शकील आज़मी
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कुर्ती मलमल दी!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं अपने स्वर में यह पंजाबी टप्पा प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे जगजीत सिंह जी ने गाया था- आशा है आपको पसंद आएगा,धन्यवाद। *****
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रफ़्तार में रहने के लिए!
ऐसी मजबूरी नहीं है कि चलूँ पैदल मैं,ख़ुद को गर्माता हूँ रफ़्तार में रहने के लिए| शकील आज़मी
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दरबार में रहने के लिए!
मैं ने देखा है जो मर्दों की तरह रहते थे,मस्ख़रे बन गए दरबार में रहने के लिए| शकील आज़मी
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मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं हक़ीक़त फिल्म के लिए कैफी आज़मी साहब की लिखी एक नज़्म अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ , जिसे मदन मोहन जी के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी जी ने गाया था- मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था, कि वो रोक लेगी, मना लेगी…
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बाज़ार में रहने के लिए!
हर घड़ी चश्म-ए-ख़रीदार में रहने के लिए,कुछ हुनर चाहिए बाज़ार में रहने के लिए| शकील आज़मी
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और कब तक!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि तथा मेरे अत्यंत प्रिय गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। किशन सरोज जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह नवगीत– युग हुए संघर्ष करतेवर्ष को नव वर्ष करतेऔर…
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तक़ाज़ा है ये ग़ैरत का!
तिरी नज़रों से गिर कर आज भी ज़िंदा हूँ मैं क्या ख़ूब, तक़ाज़ा है ये ग़ैरत का पशेमानी से मर जाऊँ। महशर आफ़रीदी
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ग़ज़ल-ख़्वानी से मर जाऊँ!
बहुत से शे’र मुझ से ख़ून थुकवाते हैं आमद पर,बहुत मुमकिन है मैं एक दिन ग़ज़ल-ख़्वानी से मर जाऊँ। महशर आफ़रीदी