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ओ शतरूपा !
एक बार फिर से आज मैं स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| कुमार शिव जी की पंक्तियाँ जो मुझे हमेशा याद रहती हैं, वे हैं- ‘काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी, देखी हमने अपनी सालगिरह देखी’ और ‘फ्यूज बल्बों के अद्भुद समारोह में, रोशनी को शहर से निकाला गया’| लीजिए…
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मौसम बहुत सताएगा!
तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है,तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सताएगा | बशीर बद्र
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किस रास्ते से आएगा!
मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ ,अगर वो आया तो किस रास्ते से आएगा | बशीर बद्र
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आंखें हमारी कहां से लाएगा!
तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा, मगर वो आंखें हमारी कहां से लाएगा| बशीर बद्र
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ज़ुबां पे दर्द भरी दास्तां चली आई!
आज फिर से मैं हम सबके प्यारे मुकेश जी का एक और बहुत प्यारा गीत शेयर कर रहा हूँ, यह गीत है पुरानी फिल्म मर्यादा से है, जिसे आनंद बक्षी जी ने लिखा था और कल्याणजी आनंद जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने इसे अनोखे अंदाज में गाया है | ज़िंदगी में ऐसा…
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बिखर क्यूँ नहीं जाता!
वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है ,वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नहीं जाता | निदा फ़ाज़ली
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उलझी हुई राहों का तमाशा!
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता| निदा फाज़ली
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दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता !
वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता| निदा फ़ाज़ली