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शर्माना क्या घबराना क्या!
फिर हिज्र की लम्बी रात मियाँ संजोग की तो यही एक घड़ी।जो दिल में है लब पर आने दो शर्माना क्या घबराना क्या॥ इब्ने इंशा
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सजनी से करोगे बहाना क्या!
शब बीती चाँद भी डूब गया ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े में।क्यूँ देर गए घर आए हो सजनी से करोगे बहाना क्या॥ इब्ने इंशा
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उस झोली को फैलाना क्या!
इस दिल के दरीदा दामन को देखो तो सही सोचो तो सही।जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली को फैलाना क्या॥ इब्ने इंशा
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लो करने आ गए जिरह!
आज फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय कवि और नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बाकी क्षेत्रों की तरह कविता और गीत, नवगीत की दुनिया में भी कुछ सृजनधर्मी रचनाकार होते हैं और बहुत से ऐसे लोग होते हैं जिनके पास रचना-कौशल या प्रतिभा तो नहीं होती परंतु तर्क…
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क्यों मेरे शेर हैं मक़बूल!
मुझसे करते हैं “क़तील” इसलिये कुछ लोग हसद,क्यों मेरे शेर हैं मक़बूल हसीनाओं में| क़तील शिफ़ाई
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किसी टूटे हुए दिल में होगा!
वो ख़ुदा है किसी टूटे हुए दिल में होगा,मस्जिदों में उसे ढूँढो न कलीसाओं में| क़तील शिफ़ाई
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मेरे हाथ की रेखाओं में!
जिस बरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है,उसको दफ़्नाओ मेरे हाथ की रेखाओं में| क़तील शिफ़ाई
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अब तो महंगाई के चर्चे हैं!
हौसला किसमें है यूसुफ़ की ख़रीदारी का,अब तो महंगाई के चर्चे हैं ज़ुलैख़ाओं में| क़तील शिफ़ाई