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तेरे शहर से गुज़रते हुए!
ये वाकया है तेरे शहर से गुज़रते हुए,हरे हुए हैं कई ज़ख्म दिल के भरते हुए। मिलाप चंद राही
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लरजना ज़ुबां का!
रवां-दवां थी, सियासत में रंग भरते हुए,लरज़ गई है ज़ुबां, दिल की बात करते हुए। मिलाप चंद राही
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अंग-अंग डोल गई रंग भरी बातें!
आज एक बार फिर से मधुर और सृजनशील गीतकार सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने जहां राष्ट्र और राष्ट्रभाषा को लेकर बहुत प्रेरक गीत लिखे हैं, वहीं उन्होंने बहुत नाजुक मनोभावों और मनः स्थितियों का चित्रण भी अपने गीतों में बड़ी कुशलता से किया है| लीजिए आज प्रस्तुत…
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एक दिल एक तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं !
आओ आने की करें बात, कि तुम आए हो,अब तुम आए हो तो मैं कौन सी शै नज़र करूँ,के मेरे पास सिवा मेहर–ओ–वफ़ा कुछ भी नहीं| एक दिल एक तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं | अली सरदार जाफ़री
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बिखर जाएगा, फिर रात का रंग!
तुम नहीं आओगे जब, फिर भी तो तुम आओगे,ज़ुल्फ़ दर ज़ुल्फ़ बिखर जाएगा, फिर रात का रंग,शब–ए–तन्हाई में भी लुत्फ़–ए–मुलाक़ात का रंग| अली सरदार जाफरी
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महताब के खंज़र की तरह!
तुम नहीं आए अभी, फिर भी तो तुम आए होरात के सीने में महताब के खंज़र की तरहसुब्हो के हाथ में ख़ुर्शीद के सागर की तरह| अली सरदार जाफ़री
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तब भी तो तुम आए थे!
जब नहीं आए थे तुम, तब भी तो तुम आए थेआँख में नूर की और दिल में लहू की सूरतयाद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरत| अली सरदार जाफरी
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अब मुझे चमन से क्या लेना!
आज मैं मुकेश जी और लता जी का गाया एक युगल गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, यह गीत 1971 में रिलीज हुई फिल्म- पारस के लिए लता जी और मुकेश जी ने कल्याणजी-आनन्दजी के संगीत निर्देशन में गाया था और इसे लिखा था इंदीवर जी ने| यह रोमांटिक गीत आज भी श्रोताओं को अपनी मधुरता…