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विसर्जन!
छायावाद युग के कवियों और कविताओं का उल्लेख महादेवी जी को याद की बिना कैसे पूरा हो सकता है| महादेवी जी का भी उस युग के साहित्य में अमूल्य योगदान है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की यह कविता – निशा की, धो देता राकेशचाँदनी में जब अलकें खोल,कली से कहता था…
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सुलगती रेत रखकर चल दिया!
मेरी मुट्ठी में सुलगती रेत रखकर चल दिया,कितनी आवाज़ें दिया करता था ये दरिया मुझे| बशीर बद्र
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इस तरह माँगा मुझे!
तुमने देखा है किसी मीरा को मंदिर में कभी,एक दिन उसने ख़ुदा से इस तरह माँगा मुझे| बशीर बद्र
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इस तरह से कर गया तन्हा मुझे!
जिस तरह वापस कोई ले जाए अपनी छुट्टियाँ,जाने वाला इस तरह से कर गया तन्हा मुझे| बशीर बद्र
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ख़ुदा ने दे दिया क्या-क्या मुझे!
चाँद चेहरा, जुल्फ दरिया, बात खुशबू, दिल चमन,ये तुम्हें देकर ख़ुदा ने दे दिया क्या-क्या मुझे| बशीर बद्र
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आग का दरिया मुझे!
उसको आईना बनाया, धूप का चेहरा मुझे,रास्ता फूलों का सबको, आग का दरिया मुझे| बशीर बद्र
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लौ को ज़रा सा कम कर दे!
चमकने वाली है तहरीर मेरी क़िस्मत की,कोई चिराग़ की लौ को ज़रा सा कम कर दे| बशीर बद्र
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मुझे गिलास बड़े दे !
यहाँ लिबास, की क़ीमत है आदमी की नहीं,मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे| बशीर बद्र
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लफ्ज़ों को मोहतरम कर दे!
सँवार नोक पलक अबरूओं में ख़म कर दे,गिरे पड़े हुए लफ्ज़ों को मोहतरम कर दे| बशीर बद्र