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हक़ीक़त पर्वतों की राइयां हैं!
बिके पानी समन्दर के किनारे,हक़ीक़त पर्वतों की राइयां हैं| सूर्यभानु गुप्त
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अपनी ही ख़ुद परछाइयाँ हैं!
है ऐसी तेज़ रफ़्तारी का आलम,कि लोग अपनी ही ख़ुद परछाइयाँ हैं| सूर्यभानु गुप्त
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यहां भी है वहां भी!
आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय शायर ज़नाब निदा फ़ाज़ली साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल में वास्तव में उन्होंने भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी बात कही है और बताया है कि धार्मिक उन्माद में बहने वाले लोग इधर भी हैं और उधर भी| जो सज्जन…
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मेरा दिल ही दुखाने आई!
तेरी मानिंद तेरी याद भी ज़ालिम निकली,जब भी आई है मेरा दिल ही दुखाने आई| कैफ़ भोपाली
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इक आवाज़ बुलाने आई!
मैंने जब पहले-पहल अपना वतन छोड़ा था,दूर तक मुझको इक आवाज़ बुलाने आई| कैफ़ भोपाली